1-बद्रीनाथ धाम की  की उँचाई 3,133 मी.

भगवान विष्णु का दरबार
चारों धामों में सर्वश्रेष्ट हिन्दु धर्म का सबसे पावन तीर्थ, हर श्रद्धालु की मंजिल नर और नारायण पर्वत श्रंखलाओं से घिरा बद्रीनाथ, अलकनंदा नदी के बाऐँ तट पर नील कठं श्रृंखला की पृष्ट भूमि पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में यह स्थल बदरियाँ (जंगली बेरों) से भरा रहने के कारण इसको बद्री बन भी कहा जाता था।
3,133 मी. की उँचाई पर स्तिथ बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को अर्पित है। 15 मी. की उँचे इस मंदिर का निर्माण 8वीं सदी के बद्धिजीवी संत आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा किया गया था। यह मंदिर बर्फीले तुफानों के कारण कई बार क्षति ग्रस्थ हुआ और पुनः निर्मित किया गया है। सजीव सिंहद्वार इस प्राचीन मंदिर को एक नवीन छवि प्रदान करता है। मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप। मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित है। मुख्य मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की काले पाषाण की शीर्ष भाग मूर्ति है। दाहीने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियाँ है। आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा यंहा एक मठ की भी स्थापना की गई थी।
पंच बद्री
केदारखण्ड स्तिथ श्री बद्रीनाथ के सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराघ्य देव श्री बद्रीनाथ के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। नारायण के पाचों रूपों की पांच बद्रीयाँ निम्न प्रकार से है। वीशाल बद्री के नाम से बद्रीनाथ, पंच बद्रीयों में से एक है। बद्रीनाथ का श्रद्धेय मंदिर पौराणिक गाथाऔं, कथनों और घटनाऔं का अभिन्न अंग है। इसकी पवित्रता धर्मशास्त्रों में स्पष्ट शब्दों में अंकित है। स्वर्ग, धरती और पाताल में तीर्थ स्थल है लेकिन बद्रीनाथ जैसा न कोई है न कोई होगा। कहा जाता है कि जब गंगा देवी मानव जाति के दुःखों को हरने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी। अतः गंगा की धारा बारह जल मार्गों में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु के निवास स्थान के गौरव से शोभित होकर बद्रीनाथ कहलाया। आदिगुरू शंकाराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मन्दिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। अप्रैल-मई से अक्टूवर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिये खुला रहता है। बद्रीनाथ ऋषिकेश से 300 कि.मी., कोटद्वार से 327 कि.मी. तथा हरिद्वार, देहरादून, कुमाँऊ और गढ़वाल के सभी पर्यटन स्थलों के सुविघाजनक मार्गों से जुड़ा है। चरण पादुका, तप्तकुण्ड, ब्रह्मकपाल, नीलकुण्ड और शेषनाथ यहां अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

विशाल बद्रीः (श्री बद्रीनाथ में) श्री बद्रीनाथ की देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यहीं कृष्ण तथा अर्जुन के रूप में अवतरित हुए तत्पश्चात एक नारद शिला के निचे मूर्ति के रूप में बद्रीनारायण मिले। जिन्हें बद्री विशाल के नाम से जाना जाता है।
श्री योगध्यान बद्रीः (पाण्डुकेश्वर में) जोशीमठ तथा पीपलकोटी पर ध्यान बद्री का मन्दिर स्थित है। कौरवों से विजय प्राप्त कर, भय के कारण पांडव हिमालय की तरफ आये और यहां उन्होंने राजा परीक्षित को अपनी राजधानी हस्तिनापुर सौंप दी तथा स्वर्गरोहण से पूर्व यंहा घोर तपस्या की।
भविष्य बद्रीः (सुनाई जोशीमठ के पास) जोशीमठ से 15 कि.मी. की दूरी पर भविष्य बद्री का मन्दिर स्थित है। आदी ग्रन्थों के अनुसार यही वह स्थान है जहां बद्रीनाथ का मार्ग बन्द हो जाने के पश्चात धर्मावलम्बी यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
वृद्ध बद्रीः (अणिमठ पैनीचट्टी के पास) जोशीमठ से 8 कि.मी. दूर 1380 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जब मनुष्य ने कलयुग में प्रवेश किया तो भगवान विष्णु मन्दिर में चले गये। यह मन्दिर वर्ष भर खुला रहता है।
आदी बद्रीः कर्ण प्रयाग-रानी खेत मार्ग पर कर्ण प्रयाग से 18 कि. मी. दूर स्थित है। यहां 16 छोटे मन्दिरों का समूह है। ऐसा विशवास है कि इन मन्दिरों के निर्माण की स्वीकृति गुप्तकाल में आदीशंकराचार्य ने दी थी जो कि हिन्दू आदर्शों के प्रचार-प्रसार को देश के कोने-कोने में करने के लिए उद्दत् थे।
पचं प्रयाग
जिस प्रकार प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा, यमुना तथा सरस्वती के दर्शन होते हैं, उसी प्रकार उत्तराखण्ड में पंच प्रयाग के अलग-अलग दर्शन होते हैं। ये पंच प्रयाग मुख्य नदियों के संगमों पर स्थित हैं-
देव प्रयागः हरिद्वार से 93 कि. मी. की दूरी पर भागिरथी तथा अलकनंदा के संगम पर स्थित है। शिव मन्दिर और रघुनाथ मन्दिर यहाँ के मुख्य आकर्षण है। यहीं से भागिरथी नदी गंगा के नाम से जानी जाती है। संगम पर गंगा की घारा के मध्य टीला डोण्डेश्वर प्रसिद्ध है।
रूद्र प्रयागः देव प्रयाग से 71 कि. मी. अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदीयों के संगम पर स्थित है। यहाँ नारद जी ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी। यहाँ पर चामुण्डा देवी व रूद्रनाथ मन्दिर दर्शनीय है।
कर्ण प्रयागः रूद्र प्रयाग से 31 कि. मी. की दूरी पर कर्ण प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा पिण्डर नदी का संगंम है। कहा जाता है कि कर्ण ने यहाँ पर कठोर तपस्या की थी। यहाँ उमा और कर्ण मन्दिर दर्शनीय है।
नन्द प्रयागः कर्ण प्रयाग से 21 कि. मी. की दूरी पर नन्द प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदीयों का संगंम है। भगवान विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए नन्द वंश के राजा ने यहाँ तपस्या की थी। यहाँ गोपाल जी का मन्दिर दर्शनीय है।
विष्णु प्रयागः गंगा जी की सहायक नदी अलकनंदा नाम से प्रसिद्ध है। अलकनंदा एवं धौली गंगा के संगम को विष्णु प्रयाग कहते हैं। यहाँ भगवान विष्णु की प्रतिमा और विष्णुकुण्ड दर्शनीय है।
बद्रीनाथ

नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व लिए पर्यटकों को बहुत सुहाता है। विशाल बद्री के नाम से जाने वाला बद्रीनाथ पंच बद्री में सबसे बड़ा है। भगवाल विष्णु का ये स्थल आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा बनाया गया। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल बनाए- उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी ।

माना जाता है, पाण्डव अपनी स्वर्ग की यात्रा में जाते समय यहां से और बॉर्डर के अन्तिम गांव माणा से गुजरे थे। यह भी माना जाता है कि माणा में मौजूद एक गुफा में व्यास ने महाभारत लिखी थी।

बद्रीनाथ में 130 डिग्री सैल्सियस खौलता तप्त कुंड और सूर्य कुंड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।

श्रोत- विकी

1- केदारनाथ धाम की कुल उंचाई 3581 मीटर

2-गंगोत्री  कुल उचाई 3200 मीटर

3-यमुनोत्री कुल उंचाई 4421 मीटर

केदारनाथ धाम

भगवान शिव के 12 ज्योतिरलिगों में सबसे महत्वपूर्ण पर्वत-मण्डलों के मध्य एकचित ध्यान लीन केदारनाथ तीर्थ 3581 मी. की ऊँचाई पर मंदाकिनी के तट पर स्तिथ है। हिन्दु धर्म में केदारनाथ की आस्था और मान्यता का कोई पार नहीं है। इस पावन तीर्थ स्थल का उद़गम महाभारत के पृष्ठों में अंकित है। पौराणिक मीन्यतानुसार केदारनाथ में शिवलिंग, तुंगनाथ में बाहु, रूद्रनाथ में मुख, पदमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा के रूप में पंचकेदार में शिव अर्चना की जाती है। 8 वीं सदी में आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पाण्डवों के प्राचीन मंदिर के समीप है। मंदिर की दीवारों पर देवताओं और पौराणिक गथाओं के चित्रण बड़े सजीव ढंग से अंकित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पर नन्दी बैल की मूर्ती, पूजा के लिए गर्वगृह, श्रद्धालुओं और आगन्ततुकों के लिए मण्डप, यही केदारनाथ मंदिर का स्वरूप है। सर्दियों में केदारनाथ बर्फ से ढके होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता है। मई से अक्टूवर के बीच केदारनाथ मंदिर के दर्शनों के लिये उपयुक्त समय है। आदिगुरू शंकाराचार्य की समाधि केदारनाथ मंदिर के पीछे है।
पौराणिक मतानुसार पांडव ने कुरूक्षेत्र महायुद्ध के पश्चात हस्तिनापुर का राज्य, राजा परिक्षित को सौंप कर अपने परिजनों की मृत्यु का प्रायश्चित करने के लिए उत्तराखण्ड की ओर चल दिये। पर्वत-मण्डल के मध्य इस पावन स्थल पर पहुँचने के बाद पांडवों ने यहाँ पर केदारनाथ मंदिर की स्थापना की।
केदारनाथ मंदिर के प्रमुख देव शिव का सर्दियों का निवास उखीमठ है जो केदारनाथ के पुजारी (रावल) का स्थान भी है। ऋषिकेश से केदारनाथ 223 कि. मी. दूरी पर है। केदारनाथ के पावन दर्शनों के लिए 14 कि. मी. की पद-यात्रा गौरीकुण्ड से आरंभ होती है। यंहा के मुख्य आकर्षक गौरी देवी का मंदिर और गर्म पानी के कुंड हैं। हरे भरे जंगलों के बीच मनमोहक प्राकृतिक दृष्य के अलौकिक आनन्द के साथ श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं, चार-पांच कि. मी. के बाद चट्टीयाँ आती हैं जहाँ पर खाने-पीने की चीजें उपलब्ध होती हैं। जब तीर्थयात्री पहाड़ से निकलते झरनों का अद्भुत दृश्य देखते हैं तो उन्हें लगता है कि वास्तव में हम स्वर्ग में पहुँच गये हैं। अंत में गरूड़ चटटी आती है जहाँ से केदारनाथ मंदिर के पीछे की बर्फीली श्रृखलाएं नजर आने लगती हैं और अपनी मंजील तक पहुंचने का सुख प्राप्त होता है।
पंच केदार
श्री केदारनाथः
यह सोन प्रयाग से 19 कि.मी. की दुरी पर स्थित है।
श्री तुंगनाथः गोपेश्वर से 19 कि. मी. की दूरी पर तुगंनाथ का मन्दिर है। इसके निकट आकाश गंगा नामक श्रोत है। तुंगनाथ शिखर तीन जलधाराओं का उद्गम स्थल है।
मद महेश्वरः माला चट्टी से 25 कि. मी. की दूरी पर मद महेश्वर महादेव का मन्दिर है। चौखम्भा की तलहटी पर 3289 मी. की ऊंचाई पर स्थित यह एक अद्वितीय मन्दिर है। यहां के जल की कुछ बूदें ही मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयाप्त मानी जाती है।
कल्पेश्वरः हेलंग से 9 कि. मी. की दूरी पर कल्पेश्वर महादेव का मन्दिर है। यह ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। ऋषि अधर्य ने यहां पर कठिन तपस्या करके सुप्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी का सृजन किया था।
रूद्रनाथः मण्डल चट्टी से 24 कि.मी. की ऊंचाई पर भगवान रूद्रनाथ का मन्दिर है। अपने पूर्वजों के क्रिया-कर्म, तर्पण आदी तथा उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए धर्मावलंबी यहां आते हैं।

भारत के उत्तर-पश्चिम में हिमालय की चोटी में बसे केदारनाथ मंदिर की अपनी अलग ही गरिमा है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिन्गों में से एक है। मंदाकिनी नदी के शीर्ष के नजदीक 3584 मीटर की उंचाई पर बसा ये मंदिर एक पवित्र तीर्थस्थान है। हर साल भारी संख्या में तीर्थयात्री और संसार के पर्यटक भक्ति-भाव और रोमांच लिए यहां घूमने आते हैं।

महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अपनी हिमालय यात्रा के दौरान पांडव भगवान शिव से मिलना चाहते थे। पर भगवान शिव इस भेंट के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि पांडव गोत्र हत्या के दोषी थे। उन्हें आते देख शिव ने बैल का भेष धारण कर लिया। पर जब उन्हें लगा कि उनके बदले भेष ने कोई काम नहीं किया, तो बैल जमीन के नीचे कूदने की कोशिश करने लगा।

भीम ने फुर्ती से बैल के पीछे के पैर पकड़ लिए। इस जद्दोजहद में भगवान शिव के शरीर के विभिन्न हिस्से केदारनाथ में अलग-अलग जगह फैल गए। नाभि सहित धड़ मद्महेश्वर में, भुजाऐं तुंगनाथ में, चेहरा रुद्रनाथ में और जटाऐं कप्लेश्वर में। भारत पंच केदार ट्रैक इन पांचों तीर्थस्थानों का ही भ्रमण है।

केदारनाथ की यात्रा गौरीकुंड से 14 किमी की पैदल यात्रा है। जंगलचट्टी, रामबाड़ा और गरुड़ की खूबसूरती से होते हुए यहां पहुंचा जाता है। यात्रा में रामबाड़ा से 1 किमी पहले एक अनुपम भव्य झरना भी मिलता है।

मंदिर का ऐश्वर्य उसकी वास्तुकला में दिखता है। 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गए मंदिर के पास ही है। मंदिर के पूजागृह में कई देवी-देवताओं और भारतीय पौराणिक दृष्य दिखते हैं। मंदिर के दरवाजे के बाहर नंदी बैल की प्रतिमा भी है।

 

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यमुनोत्री

उत्तरकाथी जिले में समुद्रतल से 3235 मी. ऊंचाई पर स्थित है, देवी यमुना का मंदिर- यमुनोत्री। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में जयपुर की महारानी गुलारिया ने कराया था। चार धामों में से एक धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किमी की दूरी पर है। यहां बंदरपूंछ चोटी (6315 मी ) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर को देखना अत्यंत रोमांचक है। गढ़वाल हिमालय की पश्चिम दिशा में उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यमुना पावन नदी का स्त्रोत कालिंदी पर्वत है। तीर्थ स्थल से एक कि. मी. दूर यह स्थल 4421 मी. ऊँचाई पर स्थित है। दुर्गम चढ़ाई होने के कारण श्रद्धालू इस उद्गम स्थल को देखने से वंचित रह जाते हैं। यमुनोत्री का मुख्य मंदिर यमुना देवी को समर्पित है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार यह असित मुनी का निवास था। वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था। भूकम्प से एक बार इसका विध्वंस हो चुका है, जिसका पुर्ननिर्माण कराया गया। यहाँ पर श्रधालु अविभूत हो जाते हैं और अपनी सारी थकान को भूल जाते हैं।

सूर्यकुण्ड गरम पानी के मुख्य स्त्रोतों में से एक है जिसका तापमान भी काफी अधिक होता है। श्रधालु कपड़े में चावल या आलू बाँधकर इस कुण्ड में डालते है जो थोड़ी देर में पक कर उपर आ जाते है इसी का भोग मंदिर मे लगता है और यही यहाँ का प्रसाद भी है। मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिला स्तम्भ है जिसे दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है। यमुनोत्री मंदिर परिशर 3235 मी. उँचाई पर स्थित है। यँहा भी मई से अक्टूबर तक श्रद्धालुओं का अपार समूह हरवक्त देखा जाता है। शीतकाल मे यह स्थान पूर्णरूप से हिमाछादित रहता है। मोटर मार्ग का अंतिम विदुं हनुमान चट्टी है जिसकी ऋषिकेश से कुल दूरी 200 कि. मी. के आसपास है। हनुमान चट्टी से मंदिर तक 14 कि. मी. पैदल ही चलना होता था किन्तु अब हलके वाहनों से जानकीचट्टी तक पहुँचा जा सकता है जहाँ से मंदिर मात्र 5 कि. मी. दूर रह जाता है। गंगोत्री
 हिमालय की गोद उत्तरकाशी से 104 कि. मी. की दूरी पर स्थित यह तीर्थ स्थल श्रद्धालुऔं के लिए अति महत्वपूर्ण है। मान्यता यह है कि इसी स्थान पर अवतरित होकर माँ गंगा ने धरती माता को कृतार्थ किया था। यह स्थल समुद्रतल से 3140 मी. की ऊँचाई पर स्थित है। युगों-युगों से मई से अक्टूबर तक लाखों श्रद्धालु इस पवित्र स्थल की यात्रा करते हैं। शीतकाल में यह स्थल पूर्ण रूप से बर्फ से ढक जाता है। पुराणों में कहा है कि स्वर्ग की बेटी गंगा देवी ने गंगा का रूप लेकर राजा भागीरथ के पूर्वजों का उद्घार किया था। शताब्दियों की कड़ी तपस्या के बाद ही गंगा देवी ने भागीरथ की मनोकामना पूरी की थी। गंगा को इसी लिये भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है। भागीरथी के दाएँ तट पर गंगा देवी को समर्पित गंगोत्री मंदिर है। 18वीं शताब्दी में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा इसका निर्माण हुवा था। भागीरथी या गंगा का मुख्य स्त्रोत गौमुख है जो गंगोत्री से 18 कि. मी. दूर पैदल यात्रा के रास्ते पर है। कई श्रद्धालु गौमुख को ही पूरी यात्रा मानते हुए वहाँ जाना आवश्यक समझते हैं और वहाँ पर स्नान कर अपने भाग्य को धन्य समझते हैं। जलमग्न शिवलिंग दिव्य शक्ति और आलौकिक आस्था का लजीव चित्रण है। पुराणों के अनुसार इसी स्थान पर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया था। पूर्ण शिवलिंग केवल शीत ऋतु में ही दिखाई देता है जब पानी का स्तर कम हो जाता है।

हिन्दू मान्यता के अनुसार, सूर्य की बेटे यामा ने कहा था कि जो व्यक्ति उसकी बहिन यमुना के नदी स्वरूप में स्नान करेगा, उसे वह कभी परेथान नहीं करेगा।

हनुमानचट्टी से 13 किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है। मंदिर के दर्शन से पहले चट्टान से बनी दिव्य शिला की पूजा होती है। मुख्य पूजा से पहले जमुनाबाई कुंड में पवित्र स्नान होता है।

यमुनोत्री में बर्फीले ग्लेशियर के पास ही खौलते कुंड भी हैं, जिनमें प्रमुख सूर्य कुण्ड है। इस कुण्ड में पोटली में चावल या आलू बांधकर पानी में डालकर पकाया जाता है। ये ही मंदिर का प्रसाद माना जाता है।

यात्रा का रूट- हरिद्वार से चम्बा, टिहरी, उत्तरकाशी होते हुए चार धाम कैम्प गंगोत्री।

कुल दूरी- हरिद्वार से 295 किमी।

प्रमुख  तिर्थस्थल

 

• बद्रीनाथ
• केदारनाथ
• गंगोत्री
• यमुनोत्री
• द्वारका
• जग्गनाथ पुरी
• वाराणसी
• प्रयाग
• ऋषिकेष
• हरिद्वार
• वैष्णो देवी
प्रमुख चार धाम
1. बद्रीनाथ
2. द्वारिका
3. जगन्नाथ पुरी
4. रामेश्वरम्

 

अन्य धाम
1. विश्वनाथ मन्दिर्
2. अन्नपुर्णा मन्दिर
3. काल भेरव मन्दिर
4. तुलसी मानस मन्दिर
5. संकट मोचन मन्दिर
6. दुर्गा मन्दिर , दुर्गाकुण्ड
7. भारत माता मन्दिर
बौद्ध धर्म में भी चार तीर्थ सबसे महत्त्वपूर्ण हैं:
• कपिलवस्तु जहाँ गौतम बुद्ध का जन्म हुआ
• बोधगया जहाँ उन्हें ज्ञान-प्राप्ति हुई
• सारनाथ जहाँ उन्होंने सबसे पहला उपदेश दिया
• कुशीनगर जहाँ उनका परिनिर्वाण हुआ

 

द्वारिका
द्वारिका हमारे देश के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। आज से हजारों साल पहले भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। द्वारिकाधीश मदिंर कांकरोली में राजसमंद झील के किनारे पाल पर स्थित है। कृष्ण मथुरा में पैदा हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होने द्वारका में ही किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे।
मेवाड के चार धाम में से एक द्वारिकाधीश मदिंर भी आता है, द्वारिकाधीश काफी समय पुर्व संवत 1726-27 में यहां ब्रज से कांकरोली पधारे थे । कहा जाता है कि उस समय भारत में बाहर से आए आक्रमणकारियों का सर्वत्र भय व्याप्त था, क्योंकि वे आक्रमणकारी न सिर्फ मंदिरों कि अतुल धन संपदा को लूट लेते थे बल्कि उन भव्य मंदिरों व मुर्तियों को भी तोड कर नष्ट कर देते थे । तब मेवाड यहां के पराक्रमी व निर्भीक राजाओं के लिये प्रसिद्ध था । सर्वप्रथम प्रभु द्वारिकाधीश को आसोटिया के समीप देवल मंगरी पर एक छोटे मंदिर में स्थापित किया गया, ततपश्चात उन्हें कांकरोली के ईस भव्य मंदिर में बडे उत्साह पूर्वक लाया गया ।
आज भी द्वारका की महिमा है। यह चार धामों में एक है। सात पुरियों में एक पुरी है। इसकी सुन्दरता बखानी नहीं जाती। समुद्र की बड़ी-बड़ी लहरें उठती है और इसके किनारों को इस तरह धोती है, जैसे इसके पैर पखार रही हो

 

पहले तो मथुरा ही कृष्ण की राजधानी थी। पर मथुरा उन्होने छोड़ दी और द्वारका बसाई।
द्वारका एक छोटा-सा-कस्बा है। कस्बे के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है। द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे गोमती तालाब कहते है। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते है।
इस गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट है। इनमें सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। नीचे उतरने के लिए पक्की सीढ़िया बनी है। यात्री सबसे पहले इस निष्पाप कुण्ड में नहाकर अपने को शुद्ध करते है। बहुत-से लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिंड-दान भी करतें है।
गोमती के दक्षिण में पांच कुंए है। निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद यात्री इन पांच कुंओं के पानी से कुल्ले करते है। तब रणछोड़जी के मन्दिर की ओर जाते है। रास्तें में कितने ही छोटे मन्दिर पड़ते है-कृष्णजी, गोमती माता और महालक्ष्मी के मन्दिर। रणछोड़जी का मन्दिर द्वारिका का सबसे बड़ा और सबसे बढ़िया मन्दिर है। भगवान कृष्ण को उधर रणछोड़जी कहते है। सामने ही कृष्ण भगवान की चार फुट ऊंची मूर्ति है। यह चांदी के सिंहासन पर विराजमान है। मूर्ति काले पत्थर की बनी है। हीरे-मोती इसमें चमचमाते है। सोने की ग्यारह मालाएं गले में पड़ी है। कीमती पीले वस्त्र पहने है। भगवान के चार हाथ है। एक में शंख है, एक में सुदर्शन चक्र है। एक में गदा और एक में कमल का फूल । सिर पर सोने का मुकुट है। लोग भगवान की परिक्रमा करते है और उन पर फूल और तुलसी दल चढ़ाते है। चौखटों पर चांदी के पत्तर मढ़े है। मन्दिर की छत में बढ़िया-बढ़िया कीमती झाड़-फानूस लटक रहे है। एक तरफ ऊपर की मंमें जाने के लिए सीढ़िया है। पहली मंजिल में अम्बादेवी की मूर्ति है-ऐसी सात मंजिले है और कुल मिलाकर यह मन्दिर एक सौ चालीस फुट ऊंचा है। इसकी चोटी आसमान से बातें करती है।
रणछोड़जी के दर्शन के बाद मन्दिर की परिक्रमा की जाती है। मन्दिर की दीवार दोहरी है। दो दावारों के बीच इतनी जगह है कि आदमी समा सके । यही परिक्रमा का रास्ता है।रणछोड़जी के मन्दिर के सामने एक बहुत लम्बा-चौड़ा १०० फुट ऊंचा जगमोहन है। इसकी पांच मंजिलें है और इसमें ६0 खम्बे है। रणछोड़जी के बाद इसकी परिक्रमा की जाती है। इसकी दीवारे भी दोहरी है।
दक्षिण की तरफ बराबर-बराबर दो मंदिर है। एक दुर्वासाजी का और दूसरा मन्दिर त्रिविक्रमजी को टीकमजी कहते है। इनका मन्दिर भी सजा-धजा है। मूर्ति बड़ी लुभावनी है।और कपड़े-गहने कीमती है।त्रिविक्रमजी के मन्दिर के बाद प्रधुम्नजी के दर्शन करते हुए यात्री इन कुशेश्वर भगवान के मन्दिर में जाते है। मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है। इसी में शिव का लिंग है और पार्वती की मूर्ति है।
कुशेश्वर शिव के मन्दिर के बराबर-बराबर दक्षिण की ओर छ: मन्दिर और है। इनमें अम्बाजी और देवकी माता के मन्दिर खास हैं। रणछोड़जी के मन्दिर के पास ही राधा, रूक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती के छोटे-छोटे मन्दिर है। इनके दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शारदा-मठ है।
शारदा-मठ को गुरू शंकराचार्य ने बनबाया था। उन्होने पूरे देश के चार कोनों मे चार मठ बनायें थे। उनमें एक यह शारदा-मठ है। रणछोड़जी के मन्दिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते है। गोमती के नौ घाटों पर बहुत से मन्दिर है- सांवलियाजी का मन्दिर, गोवर्धननाथजी का मन्दिर, महाप्रभुजी की बैठक। आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।
संगम-घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते है। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी है, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुण्ड’ कहते है। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिससे, राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तिया है। इसके बाद एक और राम का मन्दिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावजी कहते है। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तिया इसके बाद आती है।
इनके आगे यात्री कैलासकुण्ड़ पर पहुंचते है। इस कुण्ड़ का पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुण्ड़ के आगे सूर्यनारायण का मन्दिर है। इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की मूर्तिया है। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार है। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े उसकी देखभाल करते है। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुण्ड पहुंचते है और इस रास्ते के मन्दिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मन्दिर में पहुंच जाते है। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है। यही असली द्वारका है। इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेट-द्वारका जाते है। बेट-द्वारका के दर्शन बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नही होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते भी जा सकते है और जमीन के रास्ते भी।
जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अन्दर से भी रंग की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचन्दन कहते है। यहां मोर बहुत होते है। गोपी तालाब से तीन-मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा मन्दिर है। यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते है। कहते है, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लम्बा है। यह पथरीला है। यहां कई अच्छे और बड़े मन्दिर है। कितने ही तालाब है। कितने ही भंडारे है। धर्मशालाएं है और सदावर्त्त लगते है। मन्दिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।
बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत नरसी की हुण्डी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मन्दिर है। इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते है। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल है। ये दुमंजिले और तिमंजले है। पहला और सबसे बड़ा मलह श्रीकृष्ण का महल है। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल है। उत्तर में रूक्मिणी और राधा के महल है। इल पांचों महलो की सजावट ऐसी है कि आंखें चकाचोंध हो जाती है। इन मन्दिरों के किबाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े है। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का सिंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाये गए है। सच्ची जरी के कपड़ो से उनको सजाया गया है।
रणछोड़जी के मन्दिर की ऊपरी मंजिलें देखने योग्य है। यहां भगवान की सेज है। झूलने के लिए झूला है। खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े शीशे लगे है। इन पांचों मन्दिरों के अपने-अलग भण्डारे है। मन्दिरों के दरवाजे सुबह ही खुलते है। बारह बजे बन्द हो जाते है। फिर चार बजे खुल जाते है। और रात के नौ बजे तक खुले रहते है। इन पांच विशेष मन्दिरों के सिवा और भी बहुत-से मन्दिर इस चहारदीवारी के अन्दर है। ये प्रद्युम्नजी, टीकमजी, पुरूषोत्तमजी, देवकी माता, माधवजी अम्बाजी और गरूड़ के मन्दिर है। इनके सिवाय साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथजी के मन्दिर है। ये सब मन्दिर भी खूब सजे-सजाये है। इनमें भी सोने-चांदी का काम बहुत है।
बेट-द्वारका में कई तालाब है-रणछोड़ तालाब, रत्न-तालाब, कचौरी-तालाब और शंख-तालाब । इनमें रणछोड तालाब सबसे बड़ा है। इसकी सीढ़िया पत्थर की है। जगह-जगह नहाने के लिए घाट बने है। इन तालाबों के आस-पास बहुत से मन्दिर है। इनमें मुरली मनोहर, नीलकण्ठ महादेव, रामचन्द्रजी और शंख-नारायण के मन्दिर खास है। लोगा इन तालाबों में नहाते है और मन्दिर में फूल चढ़ाते है।
रणछोड़ के मन्दिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मन्दिर है। शंख-तालाब में नाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है। द्वारिकाधीश के रोजाना आठ मुख्य दर्शन होते हैं जिनमें मंगला, शंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, आरती एवं शयन हैं । कुछ विशेष दर्शन भी होते है, जैसे कृष्ण जन्माष्टमी, दिपावली, होली, अन्नकूट एवं छप्पनभोग आदि । दर्शनों का समय विशेष मनोरथ के दर्शन या अलग अलग मौसम के अनुरुप बदला जाता है, जैसे सर्दियों में भगवान के शयन के  दर्शन जल्दी होते हैं। प्रभु द्वारिकाधीश के मंदिर में ही अन्य दर्शनीय स्थल भी है जेसे मथुराधीश जी, लड्डु गोपाल, परिकृमा, मंदिर का समयसूचक घंटा, मंदिर का बगीचा, पुस्तकालय, तुलसी क्यारा,  मंदिर की ध्वझा व प्रसादघर  आदि ।
बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर बिरावल बन्दरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूरब की तरफ चलने पर एक कस्बा मिलता है इसी का नाम सोमनाथ पट्टल है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से मन्दिर है। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था।
कस्बे से करीब एक मील पश्चिम मे चलने पर एक और तीर्थ आता है। यहां जरा नाम के भील ने कृष्ण भगवान के पैर में तीर मारा था। इसी तीर से घायल होकर वह परमधाम गये थे। इस जगह को बाण-तीर्थ कहते है। यहां बैशाख मे बड़ा भारी मेला भरता है।बाण-तीर्थ से डेढ़ मील उत्तर में एक और बस्ती है। इसका नाम भालपुर है। वहां एक पद्मकुण्ड नाम का तालाब है।हिरण्य नदी के दाहिने तट पर एक पतला-सा बड़ का पेड़ है। पहले इस सथान पर बहुत बड़ा पेड़ था। बलरामजी ने इस पेड़ के नीचे ही समाधि लगाई थी। यहीं उन्होनें शरीर छोड़ा थासोमनाथ पट्टन बस्ती से थोड़ी दूर पर हिरण्य नदी के किनारे एक स्थान है, जिसे यादवस्थान कहते हैं। यहां पर एक तरह की लंबी घास मिलती है, जिसके चौड़े-चौड़ पत्ते होते है। यही वही घास है, जिसको तोड़-तोडकर यादव आपस में लड़े थे और यही वह जगह है, जहां वे खत्म हुए थे।
इस सोमनाथ पट्टन कस्बे में ही सोमनाथ भगवान का प्रसिद्ध मन्दिर है। इस मन्दिर को महमूद गजनवी ने तोड़ा था। यह समुद्र के किनारे बना है इसमें काला पत्थर लगा है। इतने हीरे और रत्न इसमें कभी जुडे थे कि देखकर बड़े-बड़े राजाओं के खजाने भी शरमाजायं। शिवलिंग के अन्दर इतने जवाहरात थे कि महमूद गजनवी को ऊंटों पर लादकर उन्हें ले जाना पड़ा। महमूद गजनवी के जाने के बाद यह दुबारा न बन सका। लगभग सात सौ साल बाद इन्दौर की रानी अहिल्याबाई ने एक नया सोमनाथ का मन्दिर कस्बे के अन्दर बनबाया था। यह अब भी खड़ा है।
श्रोत

 

 

 

 

रामायण घारावाहिक आपने दुरदर्शन पर देखी होगी, यदि फिर से देखना चाहें ते लिक प्रस्तुत है

काफी व्यस्त रहने के बहुत दिनो बाद आज वापस जब ब्लाग पर आया तो देखा प्रतियोगिता भी हुई विजेता भी चुने गये, छत्तीसग़ढ़ का होते हुए भी मुझे किसी ने दावत नहीं भेजा, वैसे ग़लती मेरी ही है मै खुद गायब था और मैने भी दावत किसी को नहीं भेजा, उस गलती को सुधारने के लिए आज दावत दे रहा हुँ आईये बिरयानी का मजा लेते हैं।

    सबसे पहले पाठको को यह बता दुँ कि यह लेख माहनामा अमलीजान (उर्दु मासिक पत्रिका) मुम्बई से प्रकाशित मे नवम्बर 1985 के अंक मे प्रकाशित हो चुका है । आपकी जानकारी के लिए इसका हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रकाशित कर रहा हुँ, इससे आप जान पायेगें कि जहाँ पैगम्बरे ईस्लाम हजरत मोहम्द मुस्तफा की आमद (आने) का जिक्र कुरान पाक के अलावा हिन्दु धर्म की किताबों मे भी है ।

     मुम्बई से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक मराठी अखबार शोधन ने 19 अप्रेल 1985 की प्रति, मे श्रीमान कृष्ण दातार हंगोली का लेख पैगम्बर और अवतार मराठी भाषा मे छपा है । इस लेख का उर्दु अनुवाद श्रीमान बाकर नाज़ (कल्याण) ने किया जो साप्ताहिक फौजान मे छपा । उसी लेख को उर्दु माहनामा अलमीजान ने नवम्बर 1985 मे छापा ।

     तो देखिये कृष्णदातार हंगोली का लेख   

     हिन्दु अकीदे के मुताबिक भटकती हुई इंसानियत की रहनुमाई के लिए खुदा (भगवान) की तरफ से एक कल्कि अवतार आयेगा । मालुम हो कि-मराठी और संस्कृत भषा मे कल्कि शब्द का अनुवाद आखरी और अवतार (पैगम्बर) है । (मुतर्जिम) जो दुनीयो मे भाई चारा अमनो शांति स्थापित करेगा । जो लोग उस  कल्कि अवतार (आखरी पैगम्बर) की राह मे आँखे लगाये बैठे हैं, उन्हे अब राह देखने की जरूरत नहीं है । क्योकि ये आने वाला कल्कि अवतार चौदह सौ साल पहले सर जमीने अरब पर रसूल मोहम्मद सल्ललाहो अलैहि वसल्लम नाम से जाहिर हो चुका है । और भटकती हुई इंशानियत की इस्लाह (रास्ता दिखा कर) व खिदमत बखैर-खूबी,अंजाम देकर रहमते खुदावन्दी से जा मिला है ।

    श्री कृष्णदातार लिखते हैं कि- दर्ज शुदा खेज खयालात मै अपनी तरफ से बयान नहीं कर रहा हूँ । बल्कि भारत मे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान प्रयाग युनिवर्सिटी के डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने कल्की अवतार और मोहम्द पैगम्बर नामी किताब मे पूरे सबुत के साथ पेश किये हैं । श्री वेद प्रकाश का दावा है कि-कलकी अवतार और मोहम्मद पैगम्बर एक ही हस्ती के दो अलग-अलग भाषाओं के दो नाम हैं । पंडित वेद प्रकाश जी का यह लेख भारत के आठ मशहूर संस्कृत के पंडितों ने पूरी जिम्मेदारी और तवज्जोह के साथ हिन्दु ग्रंथो की जाँच करने के बाद उसके सही होने की तसदीक़ (प्रमाण) कर इस पर अपने दस्तखत किये हैं । अपने इस दावे के सबुत मे-कि हिन्दु ग्रन्थों मे तहरीर शुदा कल्कि अवतार खुद मोहम्दुर्रसूलुल्लाह के सिवा दूसरा कोई नहीं है । श्री वेद प्रकाश जी ने हिन्दुओं की मशहुर धार्मिक किताब पुराण से नीचे लिखी चन्द दलीलें पेश की हैं ।

 (1) पुराण कहता है कि कल्कि अलतार दुनियाँ मे रहनुमाई के लिए भेजा जायेगा । जो आखरी होगा उसके बाद कोई अवतार जन्म नहूं लेगा ।

लेखक श्री वेद प्रकाश जी कहते हैं कि यह बात सिर्फ मोहम्मद सल्ललाहो अलैहि व सल्लम पर ही सादिक(लागु होती है) जाती है । क्योकि ह.मोहम्द के अलावा किसी इंशान ने आखरी अवतार होने का दावा नहीं किया है और न ही पैगम्बरे खुदा के बाद पिछले चौदह सौ साल मे किसी नये अवतार के नाजिल(अवतरित) होने की कोई दलील  मिलती है ।

  (2) कल्कि अवतार का जमाना और पैदाइश की जगह और उनके माँ-बाप से संबंधित पुराण मे जो हकीकतें दर्ज है, वो सिर्फ हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्ललाहो अलैहि वसल्लम ही के बाबत सही साबित होते हैं । क्योकि पुराण हिन्दु भाइयों के कदीम ग्रंथों मे तमाम दुनियाँ के सात द्वीपों मे तकसीम(बाँटा गया) किया गया है । जैसे जमेबूद्वीप शाबकद्वीप शालमद्वीप मलद्वीप वगैरा । और इन्ही ग्रंथों की श्लोक और हवाले से अरब देश का शुमार मलद्वीप मे होता है

  (3) पुराण मे कल्कि अवतार के वालिद(पिता) का नाम विष्णुभक्त बताया है । जबकि विष्णु संस्कृत भाषा मे खुदा(भगवान) का नाम है । और भक्त के माने गुलाम या बन्दा, इस बिना पर संस्कृत के विष्णुभक्त का अरबी अनुवाद अब्दुल्लाह होता है । और हजरत मोहम्मद पैगम्बर के वालिद(पिता) का नाम अब्दुल्लाह ही था ।

  (4) इसी तरह पुराण मे कल्कि अवतार के माँ का नाम सुमति (सोमवती) लिखा है, और सुमति संस्कृत भाषा मे मकामे अमन को कहते हैं। जो की अरबी तर्जुमा(अनुवाद) मे आमेना बन जाता है। रसुले खुदा के वालेदा(माँ) माजेदा का नाम  आमेना ही था।

(5) पुराण मे मे लिखा है कि कल्कि अवतार का गुजर-बसर खजुर और अनार होगा, औऱ वो अपने मानने वाले को गुनाहो से पाक करायेगा। गौर किया जाए तो ये सारी निशानियां रसूले अकरम के जिन्दगी मे पायी जाती है।

(6) पुराण मे दर्ज है कि परशुराम  उनको अल्लाह का पैगाम दीन की तालिम और इबादत का तरीका गुफा मे पेश करेगें। और उसी समय उसे सत्यम यानी सिद्क की  बसारत होगी। पैगम्बरे ईस्लाम की दीनी और अखलाकी तालीम हेरा नामक गार(गुफा) से हुइ थी, और उसी जिबरील नामी फरिस्ते ने परशुराम के रुप मे आकर उन्हे कुरान की बसारत भी दी थी।

(7)हिन्दू ग्रंन्थो मे दर्ज है कि-कल्कि को शिवा की तरफसे एक निहायत तेज रफ्तार का घोड़ा भी दिया जायेगा। तअज्जुब कि बात है कि मोहम्मद सल्ललाहो अलैही वसल्लम को ही मेराज की सफर मे शिवा यानी खुदा की तरफ से इंतेहाई तेज रफ्तार बुर्राक(घोड़े का नाम) इनायत हुआथा।

( 8) पुराण बताता है कि- कल्कि अवतार अपने मखदूम(बिशेष) चार शागिर्दो की मदद से शैतान को शिकस्त फाश देगा। पैगम्बरे इस्लाम ही ने अपने चार खुलफा (1) हजरत अबुबक्र सिद्दीक (2) हजरत उमर फारुके आजम (3) हजरत उस्माने गनी (4) हजरत अली शेरे खुदा के साथ, सरजमीने अरब को शिर्क (मिश्रण) औऱ कुफ्र (नास्तिकता) की लअनत से हमेशा के लिए पाक कर दिया था।

(9) पुराण का कहना है कि कल्कि अवतार को हक (सत्य) की लडा़मे देवताओ की मदद हासिल होगी। लिहाजा पैगम्बरे इस्लाम की इमदाद के लिए अल्लाह की तरफ से फरिस्तो की लश्कर(सेना) का मुअय्यन होना खुद कुरआने पाक की आयत से  साबित है।

पंडित वेद प्रकाशजी ऊपर लिखे नौ नुकात अपनी किताब कल्कि अवतार और मुहम्द साहब ने वाज़ह तौर से पेश किए है। इस किताब मे चन्द मुकामात (हजारो ) पर कल्कि अवतार को जगतगुरु के नाम से भी मुखातिब किया गया है। जिसका हम मअनी(अनुवाद) ऊर्दु लफ्ज (शब्द) रहबरे आलम है। किताब मे एक जगह लिखा है कि-वो जगतगुरु रोशनी से भी तेज रफतार जानवर पर सवार होकर हफत (सात) आसमान की सैर करेंगे उस किताब का जुमला पढ़ने के बाद रसुले पाक के अलावा दुनिया का कोई इंसान जगतगुरु या कल्कि अइवतार होने कि दावा करने कि हिम्मत नही रख सकता। इसी किताब के एक और पैरा मे दर्ज है-कि- गुफा कि समाधि मे जगतगुरु को परमेश्वरी कृपा का साक्षात्कार होगा। गारे हेरा(गुफा) कि चिल्ला कशी(समाधि) मे जिबरील अमीन का पैगाम कुरान ही तो इस जाविये हकीकी तरजुमा और तफसील है। और फिर पंडित वेदप्रकाश अपनी किताब मे लिखते हैं कि जगत गुरु पहाड़ के शुमाल (उत्तर दिशा) मे हमेशा के लिए परयन (पलायन) करेंगे । ये खयाल मक्का के शुमाल(उत्तर) की तरफ मदीना मुनौवरा कि हिजरत(जाना) का वाकया अपने अंदर जज्ब किए हुए है। फिर ये किताब कहती है कि कल्कि अवतार तलवार बदस्त फतेहाना अपने शहर मे दाखिल(प्रवेश) होगी यानी मदनी जिन्दगी मे बिला आखिर फतह मक्का का वाकया पैगम्बरे इस्लाम के बारे मे हिन्दू ग्रंथो का हजारो साल पहले दिया हुआ फैसला है। उन तमाम वजाहत से साबित होता है कि जनाब रसुले अकरम सल्ललाहो अलैहि व सलल्म आलमे इंसानियत कि फलाह (कामयाबी)और रहनुमाई (मार्गदर्शन) के लिए दुनिया के आखिरी हादी यानी खातेमुल अंबिया बन कर सरजमिने अरब मे जलवागरी फरमाई। जिसकी शहादत (गवाही ) न सिर्फ कुरआन पाक बल्कि तमाम आसमानी किताबों के अलावा हिन्दू मजहब के धर्म ग्रंथो मे भी हजारो साल पहल अपने मानने वालो को दी थी।

आज भी जिन्हे कल्कि अवतार या आखिरी पैगम्बरे हक की तलास है इन्हे चाहिए कि वो पैगम्बरे इस्लाम रसुले अरबी की तालिमात कि तरफ अपने आप को रुजूअ करे। इसी मे इंसानियत की कामयाबी और आखिरत कि कामयाबी का राज पोशीदा है।

सौबत साप्ताहिक, पूना, 23 मार्च 1985

शोधन साप्ताहिक, मुम्बई, 19 अप्रेल 1985

माहनामा अलमीजान मुम्बई, नवम्बर 1985

 आपकी टिप्पड़ीयों का स्वागत है।

आइए पैगम्बरे ईस्लाम पर बनी यह फिल्म देखिये

Part one

Part 2

Part 3

Part 4

Part 5

Part 6

Part 7

Part 8

Part 9

Part 10

Part 11

Part 12

Part 13

Part 14

Part 15

Part 16

Part 17

Part 18

रमज़ान के मौके पर आइये कुरआन को जाने,  यह किताब आज से 1400 साल पहले प्रकाश मे आई, उस समय विज्ञान इतना विकसित नहीं था, ईस किताब मे लिखी गई तमाम तहरीरों(आयत) को विज्ञान ने आज सच माना है । कुरआन सचमुच अदभुत आश्चर्य है । 

आईये देखें विडियो पर

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गणेश चतुर्थी और रमज़ान की बधाईयाँ स्वीकार करें ।

देखें यह विडियो

ऐ मेरे हम शकल,

चेहरा नही शीशा बदल,

झाँक अपने अंदर तू चल,

चेहरा नही शीसा बदल।