1-बद्रीनाथ धाम की की उँचाई 3,133 मी.
भगवान विष्णु का दरबार
चारों धामों में सर्वश्रेष्ट हिन्दु धर्म का सबसे पावन तीर्थ, हर श्रद्धालु की मंजिल नर और नारायण पर्वत श्रंखलाओं से घिरा बद्रीनाथ, अलकनंदा नदी के बाऐँ तट पर नील कठं श्रृंखला की पृष्ट भूमि पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में यह स्थल बदरियाँ (जंगली बेरों) से भरा रहने के कारण इसको बद्री बन भी कहा जाता था।
3,133 मी. की उँचाई पर स्तिथ बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को अर्पित है। 15 मी. की उँचे इस मंदिर का निर्माण 8वीं सदी के बद्धिजीवी संत आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा किया गया था। यह मंदिर बर्फीले तुफानों के कारण कई बार क्षति ग्रस्थ हुआ और पुनः निर्मित किया गया है। सजीव सिंहद्वार इस प्राचीन मंदिर को एक नवीन छवि प्रदान करता है। मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप। मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित है।
मुख्य मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की काले पाषाण की शीर्ष भाग मूर्ति है। दाहीने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियाँ है। आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा यंहा एक मठ की भी स्थापना की गई थी।
पंच बद्री
केदारखण्ड स्तिथ श्री बद्रीनाथ के सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराघ्य देव श्री बद्रीनाथ के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। नारायण के पाचों रूपों की पांच बद्रीयाँ निम्न प्रकार से है। वीशाल बद्री के नाम से बद्रीनाथ, पंच बद्रीयों में से एक है। बद्रीनाथ का श्रद्धेय मंदिर पौराणिक गाथाऔं, कथनों और घटनाऔं का अभिन्न अंग है। इसकी पवित्रता धर्मशास्त्रों में स्पष्ट शब्दों में अंकित है। स्वर्ग, धरती और पाताल में तीर्थ स्थल है लेकिन बद्रीनाथ जैसा न कोई है न कोई होगा। कहा जाता है कि जब गंगा देवी मानव जाति के दुःखों को हरने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी।
अतः गंगा की धारा बारह जल मार्गों में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु के निवास स्थान के गौरव से शोभित होकर बद्रीनाथ कहलाया। आदिगुरू शंकाराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मन्दिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। अप्रैल-मई से अक्टूवर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिये खुला रहता है। बद्रीनाथ ऋषिकेश से 300 कि.मी., कोटद्वार से 327 कि.मी. तथा हरिद्वार, देहरादून, कुमाँऊ और गढ़वाल के सभी पर्यटन स्थलों के सुविघाजनक मार्गों से जुड़ा है। चरण पादुका, तप्तकुण्ड, ब्रह्मकपाल, नीलकुण्ड और शेषनाथ यहां अन्य दर्शनीय स्थल हैं।
विशाल बद्रीः (श्री बद्रीनाथ में) श्री बद्रीनाथ की देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यहीं कृष्ण तथा अर्जुन के रूप में अवतरित हुए तत्पश्चात एक नारद शिला के निचे मूर्ति के रूप में बद्रीनारायण मिले। जिन्हें बद्री विशाल के नाम से जाना जाता है।
श्री योगध्यान बद्रीः (पाण्डुकेश्वर में) जोशीमठ तथा पीपलकोटी पर ध्यान बद्री का मन्दिर स्थित है। कौरवों से विजय प्राप्त कर, भय के कारण पांडव हिमालय की तरफ आये और यहां उन्होंने राजा परीक्षित को अपनी राजधानी हस्तिनापुर सौंप दी तथा स्वर्गरोहण से पूर्व यंहा घोर तपस्या की।
भविष्य बद्रीः (सुनाई जोशीमठ के पास) जोशीमठ से 15 कि.मी. की दूरी पर भविष्य बद्री का मन्दिर स्थित है। आदी ग्रन्थों के अनुसार यही वह स्थान है जहां बद्रीनाथ का मार्ग बन्द हो जाने के पश्चात धर्मावलम्बी यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
वृद्ध बद्रीः (अणिमठ पैनीचट्टी के पास) जोशीमठ से 8 कि.मी. दूर 1380 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जब मनुष्य ने कलयुग में प्रवेश किया तो भगवान विष्णु मन्दिर में चले गये। यह मन्दिर वर्ष भर खुला रहता है।
आदी बद्रीः कर्ण प्रयाग-रानी खेत मार्ग पर कर्ण प्रयाग से 18 कि. मी. दूर स्थित है। यहां 16 छोटे मन्दिरों का समूह है। ऐसा विशवास है कि इन मन्दिरों के निर्माण की स्वीकृति गुप्तकाल में आदीशंकराचार्य ने दी थी जो कि हिन्दू आदर्शों के प्रचार-प्रसार को देश के कोने-कोने में करने के लिए उद्दत् थे।
पचं प्रयाग
जिस प्रकार प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा, यमुना तथा सरस्वती के दर्शन होते हैं, उसी प्रकार उत्तराखण्ड में पंच प्रयाग के अलग-अलग दर्शन होते हैं। ये पंच प्रयाग मुख्य नदियों के संगमों पर स्थित हैं-
देव प्रयागः हरिद्वार से 93 कि. मी. की दूरी पर भागिरथी तथा अलकनंदा के संगम पर स्थित है। शिव मन्दिर और रघुनाथ मन्दिर यहाँ के मुख्य आकर्षण है। यहीं से भागिरथी नदी गंगा के नाम से जानी जाती है। संगम पर गंगा की घारा के मध्य टीला डोण्डेश्वर प्रसिद्ध है।
रूद्र प्रयागः देव प्रयाग से 71 कि. मी. अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदीयों के संगम पर स्थित है। यहाँ नारद जी ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी। यहाँ पर चामुण्डा देवी व रूद्रनाथ मन्दिर दर्शनीय है।
कर्ण प्रयागः रूद्र प्रयाग से 31 कि. मी. की दूरी पर कर्ण प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा पिण्डर नदी का संगंम है। कहा जाता है कि कर्ण ने यहाँ पर कठोर तपस्या की थी। यहाँ उमा और कर्ण मन्दिर दर्शनीय है।
नन्द प्रयागः कर्ण प्रयाग से 21 कि. मी. की दूरी पर नन्द प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदीयों का संगंम है। भगवान विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए नन्द वंश के राजा ने यहाँ तपस्या की थी। यहाँ गोपाल जी का मन्दिर दर्शनीय है।
विष्णु प्रयागः गंगा जी की सहायक नदी अलकनंदा नाम से प्रसिद्ध है। अलकनंदा एवं धौली गंगा के संगम को विष्णु प्रयाग कहते हैं। यहाँ भगवान विष्णु की प्रतिमा और विष्णुकुण्ड दर्शनीय है।
बद्रीनाथ
नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व लिए पर्यटकों को बहुत सुहाता है। विशाल बद्री के नाम से जाने वाला बद्रीनाथ पंच बद्री में सबसे बड़ा है। भगवाल विष्णु का ये स्थल आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा बनाया गया। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल बनाए- उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी ।
माना जाता है, पाण्डव अपनी स्वर्ग की यात्रा में जाते समय यहां से और बॉर्डर के अन्तिम गांव माणा से गुजरे थे। यह भी माना जाता है कि माणा में मौजूद एक गुफा में व्यास ने महाभारत लिखी थी।
बद्रीनाथ में 130 डिग्री सैल्सियस खौलता तप्त कुंड और सूर्य कुंड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।
श्रोत- विकी




