“साहब की अदालत”
Posted by sahebali on August 26, 2007
मेरी अदालत अर्थात साहब की अदालत शिर्षक से इस ब्लाग की शुरूआत कर रहा हुं,यह स्थाई स्तंभ होगा इस स्तंभ मे मैं ब्यगं लिखुगां, मेरे द्वारा लिखे गये शब्दो से यदि किसी की धार्मिक, राष्ट्रीय, और मानवीय भावनावों को ठेस पंहुचती हो तो मै उन पाठको से क्षमा चाहुगां। ईस ब्लाग पर प्रदर्शित समस्त रचनायें मेरी मौलिक रचनायें हैं।
सर, आज की अदालत का पहला मुजरिम है “प्रेम”,
यह तो बड़ा सुन्दर और मासूम है।
सर, यह आपको अभी बड़ा मासूम लग रहा है । पर यह बहुत शैतान है। सुबह उठते ही लड़किओं के स्कूल के सामने, कालेज के सामने खड़े होकर आती जातीं, भोली-भाली लड़कियों पर छिंटाकशी करता है। कभी-कभी साइकिल पर जाती हुई लड़कीयों को गिरा देना ईसका काम है।
इसे कई बार समझाईस देकर छोड़ दिया गया है। किन्तु यह है कि मानता ही नहीं है। इससे पुलिस, प्रशासन और ईसके माँ-बाप और आस पड़ोस के लोग काफी परेशान हैं। सर, इसके इस अपराध के लिए इसे कड़ी सजा दी जाय, ताकि अन्य लोगों को भी सबक मिल सके।
(सभी लोग डेस्क थपथपा कर समर्थन करते हैं।)
आडर-आडर,
मुजरिम की ओर से वकील कौन है।
कोई वकील इसका केस लड़ने को तैयार नहीं है।
मुजरिम प्रेम तूम्हे अपनी सफाई में कुछ कहना है।
यस सर, माई नेम ईज प्रेम, प्रेम मिन्स लव, एन्ड लव इज लाईफ एन्ड लाईफ इज ईंज़्वाय एन्ड…
आर्डर-आर्डर….
साफ-साफ शब्दो में कहो घुमा-फिरा कर अदालत को गुमराह करने की कोशिश मत करो ।
सर, ……. हाँ, तो मै यह कह रहा था कि,
जिंदगी जिंदा दिली का नाम है,
मुर्दा दिल क्या ख़ाक जीया करते हैं।
सर, स्वतंत्र भारत मे हर तरह की स्वतंत्रता होनी चाहिए वरना हमारे जैसे दिलफेंक आशिक कहाँ जायेगें।
कोई हमदम न मिला कोई सहारा न मिला,
हम कीसी के न हुए कोई हमारा न मिला।
सारे इतिहास में देखें प्रेम शब्द की व्याख्या बढ़-चढ़ कर की गई है, रहीम, कबीर,तुलसी को देखें, लैला-मजनू, शिरी-फरहाद को देखें, लोग मुझे जबरन परेशान कर रहे है।
हर एक को हर आह का हक है,
हर एक को अपने ज़ज़बात का हक है,,
एक दिल मैं भी लेकर आया हूँ,
मुझे भी एक गुनाह का हक है।
अदालत ने सभी पक्षो को सुना और समझा, अदालत ने पाया कि मुजरिम ने स्वत्रंता का गलत मतलब निकाला है, तथा अपने प्रेम की तुलना ईतिहास मे हुई दुर्घटनाओं से की है, अतः यह अदालत फैसला देती है कि…
ईस सुंदर नौजवान को उस तरह उल्टा लटका कर रखा जाय़ ।
ताकि कोई भी यहां से निकले तो इसे देखता जाय और इच्छा होने पर इसे एक चांटा मारता जाए।
इसी के साथ आज की अदालत बर्खास्त की जाती है।
