चेहरा नहीं शीसा बदल
Posted by sahebali on September 12, 2007
ऐ मेरे हम शकल,
चेहरा नही शीशा बदल,
झाँक अपने अंदर तू चल,
चेहरा नही शीसा बदल।
देख भीतर हो जा हरा,
अब जरा तू मुस्कुरा,
मुस्कुरा के तु सम्हल,
चेहरा नही शीसा बदल।
गर कोइ रोके तुझे,
गर कोई टोके तुझे,
बदगुमा है बे अकल,
चेहरा नही शीसा बदल।
रोक सकता है तो रोक,
आँधियों की नोक झोंक,
लोग कर लेंगे नकल,
चेहरा नही शीसा बदल।
खो न जाये उम्र यूँ,
मंजिलो के दर बदर,
अब तो “साहब”तु सम्हल,
चेहरा नही शीसा बदल।
sahebali
Shastri JC Philip said
आज पहली बार आपके चिट्ठे पर आया एवं आपकी रचना का अस्वादन किया. आप स्पष्ट एवं सशक्त लिखते हैं. नियमित रूप से लिखें — शास्त्री जे सी फिलिप
मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!
sahebali said
शास्त्री जे सी फिलीप का धन्यवाद,
खुदा करे आपका स्वपन जल्द पुरा हो ।।